Wednesday, 13 July 2016

अंतर्द्वंद


मंद मंद मंद मंद
चल रहा है अंतर्द्वंद।

बात हो कर्तव्य की,
या गर्त में भविष्य की,
या फिर अधूरे सत्य की,
सब फन उठाये डसने को तैयार,
बुरे समय का तीक्ष्ण प्रहार,
खुले पंखों की उड़ान सा नहीं है आनन्द।
मंद मंद मंद मंद,
चल रहा है अंतर्द्वंद।

मेरा मुझसे छीन लिया,
धनी से मुझको दीन किया,
भावों से भी विहीन किया,
मैं मैं न हो पाया, तो मेरा होना बेकार,
बुरे समय का तीक्ष्ण प्रहार,
किससे और कैसा है ये प्रतिद्वंद?
मंद मंद मंद मंद,
चल रहा है अंतर्द्वंद।

गली गली लुटता है चैन,
मन में द्वेष है कटु है बैन,
आत्मा मर गयी, निर्लज्ज हुए नैन,
मानव लिख रहा है मानवता का उपसंहार,
बुरे समय का तीक्ष्ण प्रहार,
इंसानियत के कपाट सारे, आज हुए बंद।
मंद मंद मंद मंद,
चल रहा है अंतर्द्वंद।

पीयूष सिंह

भूत, वर्तमान और भविष्य

वह धुंधला सा, काला सा, भयानक सा जो होता प्रतीत है,
बस अभी अभी गुजरा है, वो मेरा अतीत है।

आज जो ये ख्याति है, उपलब्धि है और जो ये सम्मान है,
जो अतीत अभी गुजरा था उसी का वर्तमान है।

दूर गगन में जो सितारें हैं, पर्वतों के शिखर हैं, वही मेरा लक्ष्य है,
जो वर्तमान चल रहा है, उसी का भविष्य है।

भूत, वर्तमान, भविष्य का ये सफ़र यूँ ही चलता रहेगा,
कर्म ही सर्वोच्च था , कर्म ही सर्वोच्च है, कर्म ही सर्वोच्च रहेगा।

पीयूष सिंह

Sunday, 3 July 2016

हमारा कोई शीर्षक नहीं

हैसियत नहीं मेरी सितारों को देख सकने की,
बहुत दिनों बाद नींद आई तो थोड़ी हिम्मत कर ली
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आज मैं लुट गया कि छिन गए मेरे शब्द मुझसे,
सारे बाज़ार में ये बिक रहें हैं किसी और के नाम से।
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ये ज़िन्दगी है साहब, निभानी ही पड़ेगी,
वरना अब जीने में रक्खा क्या है?
कोरी आँखों ने नहीं देखें हैं सपने,
जो सच न हो सकें, उन सपनों में रक्खा क्या है?
जब छीन लिया सब कुछ तब तो पूछा नहीं,
अब तरस भरी खोखली सांत्वना में रक्खा क्या है?
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मैं डर जाता हूँ जब आइना देखता हूँ
कहीं फिर से न पूछ ले वो सवाल पेंचीदे
मांग न ले हिसाब ज़िन्दगी का,
खुशियाँ जो खर्च हो गयी उनकी रसीदें!!!
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ज़िन्दगी, ये तेरी जिरह करने की आदत अजीब है
खुशियाँ मिलती हैं इक लम्बी बहस के बाद।

पीयूष सिंह

एक बंधन ये भी

इस कलयुग में जहाँ भाई भाई का दुश्मन है, जहाँ भाई बहन को विदा करके भूल जाता है, जहाँ माँ को सदा यही चिंता रहती है कि उसके बेटे बड़े होकर मेरा तुम्हारा करने लगेंगे। उसी कलयुग में मेरी ये कविता उन भाइयों को, उन बहनों को समर्पित है जो एक अनोखे कभी न टूटने वाले बंधन से बंधे हुए हैं।
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हम लड़ सकते हैं, रूठ सकते हैं
मसखरी में कभी बोल झूठ सकते हैं
खुली चुनौती है उसको जो तोड़ना चाहे
आज़मा ले हुनर अपना, नहीं हम टूट सकते हैं
बहुत आयेंगे फोड़ने वाले, विष भरेंगे कानों में
आज़मा ले हुनर वो भी अपना, नहीं हम फूट सकते हैं

अम्मा तुम्हारे आँसू ये अनमोल हैं, इन्हें यूँ ही बेकार मत करो
तुम्हारे संस्कारों से बंधे हैं हमारे ये हाथ,
मर के भी ये नहीं छूट सकते हैं
राम लखन कह दूँ तो शायद अतिशयोक्ति न हो
मन से जुड़े हैं ये तार, नहीं टूट सकते हैं।

पीयूष सिंह

Saturday, 25 June 2016

उलझन

चाल मेरी बेतरतीब है, शायद
अभी ठोकरें नहीं खाई इतनी मैंने कि मैं चलना सीख जाऊँ।
कहते हैं अब भी संभल जाओ, पर शायद,
अभी गिरा नहीं मैं इतनी बार कि मैं संभलना सीख जाऊँ।
कहते हैं लोग कि छोड़ दो अपने आप को,
अभी और कितना बदलूँगा, कि मैं बदलना सीख  जाऊँ।
क्यों दूसरों को देख कर सीख नहीं लेता,
अभी और कितना छला जाउँगा कि मैं छलना सीख जाऊँ।
चलना, संभलना, बदलना, छलना, अब बस भी करो
या तो ये मुझे छोड़ दें, या तो मैं इनसे निकलना सीख जाऊँ।

पीयूष सिंह

Tuesday, 21 June 2016

वीरगाथा

मेरी ये कविता उन सभी साधारण व असाधारण लोगों को समर्पित है जिनकी वीरागाथायें हमें प्रेरित करती हैं निर्भीकता से कर्तव्य पथ पर बढ़ने की और हर परिस्थिति में डट कर खड़े रहने की।

वीर वो होता है, जिसे रण में किसी का भय न हो।
वीर वो होता है, जिसे रण में किसी का भय न हो।

हाथ में लेकर चले तिरंगा भारत माता के ये लाल,
आगे कर दी अपनी छाती बनकर सारे देश की ढाल,
पहले देश की आन बाद में, अपनी जान ये आती है,
इसको लेकर रत्ती भर भी मन में कभी संशय न हो।
वीर वो होता है, जिसे रण में किसी का भय न हो।

अपने अपने खेल में दिग्गज, इन पर भारी जिम्मेदारी,
प्रतिद्वंदी मुँह की खायेगा, निश्चित हो ये अबकी बारी,
नाम देश का ऊँचा करना, बस इतना सा अरमान है,
झोंक दो पूरा दम खम रण में, जय हो, पराजय न हो।
वीर वो होता है, जिसे रण में किसी का भय न हो।

मन में लेकर कठिन इरादा और मुख पर भोली मुस्कान,
हठ कर बैठा है वो मन में, तोड़ेगा प्रस्तर चट्टान
जो पहले दुर्गम था, हठ से मार्ग वहाँ बन आया है,
ऐसे ज़िद्दी की फिर बोलो कैसे जय जय न हो?
वीर वो होता है, जिसे रण में किसी का भय न हो।

उद्यम से जो सिद्ध हैं करते अपने सारे कार्य अधूरे,
नींद उन्हें कहाँ आती है जब तक सब हो जाएँ न पूरे,
कैसी भी हों परिस्थितियाँ पर घुटने टेक नहीं सकते ये,
ऐसे उद्यमी का कहो! संभव कैसे, भाग्योदय न हो?
वीर वो होता है, जिसे रण में किसी का भय न हो।

पीयूष सिंह

Friday, 17 June 2016

जीवन को लकवा मार गया

खा गयी गरीबी बचपन को
मजबूरी निगल गयी स्वाभिमान को
भूख ने थोड़ी चोरी सिखा दी
हालात पी गए खुशियों को
और इस तरह पूरे जीवन को लकवा मार गया।

पीयूष सिंह

Tuesday, 14 June 2016

भाग्य और परिश्रम

जीवन अनिश्चिताओं का नाम है
जो कभी भी पलट जाए, भाग्य उसी का नाम है।
परिश्रम जीवन का कायाकल्प है,
विषम परिस्थितियों में, ये ही इक्मात्र विकल्प है।
भाग्य भरोसे सब ठीक होगा,
यदि ऐसा लगता है, तो ये सिर्फ आपका भ्रम है।
भाग्य भरोसे आप सिर्फ बैठ सकते हैं,
पर जो चलना सिखाता है, वो कठिन परिश्रम है।

स्वर्ण पात्र में खाने वालों
राज भोग कब तक खाओगे?
नर्म बिछौना निद्रा हेतु
चैन से कब तक सो पाओगे?
भाग्य तुम्हारा अभी प्रबल है
पर कब तक इसके गुण गाओगे?
भाग्य भरोसे बैठ कहो तुम,
कब तक यूँ ही इतराओगे?
ये बदलेगा करवट जिस दिन,
उस दिन तुम मुँह की खाओगे!!!
चेतोगे जितना जल्दी तुम,
उतना जल्दी बच पाओगे।
जीवन के रण में तुम बोलो,
ये कठिन चुनौती ले पाओगे?
साथ छोड़ कर भाग्य का तुम
राह परिश्रम की चल पाओगे?
देकर अपना लहू पसीना,
कंटक गले लगा पाओगे?
लिखकर भाग्य स्वयं का तुम क्या
भाग्य विधाता बन पाओगे?
सफलता परिश्रम से जिस दिन
तुम आलिंगन कर पाओगे?
जीवन के रण के शूरवीर
उसी दिन तुम कहलाओगे।

पीयूष सिंह

Saturday, 14 May 2016

एक मृतक का जीवन

नेत्र रिक्त हैं,
नीर से, स्वप्न से,
आशाओं से, इच्छाओं से,
पीड़ाओं से, संवेदनाओं से;
एक मृत सी जीवित काया
जिसमें जीवन मात्र साँसों का नाम है।
यूँ तो वह पुरुष कमाता भी और खाता भी है,
पर,
उसकी कमाई में जीवन का यथार्थ नहीं, सिर्फ जीवन है;
उसके भोजन में जीवन का स्वाद नहीं, सिर्फ जीवन है;
लक्ष्यहीन, दिशाहीन सी चल रही है
सिर्फ !!चल रही है....

पीयूष सिंह

Saturday, 23 April 2011

आत्मकथा : एक कमरे के घर में रहने वालों की

जो एक कमरे के घर में रहते हैं
उनके दिल अक्सर बड़े होते हैं
बातें पहले तो करते नहीं, और करी
तो बातों के पक्के बड़े होते हैं ।
दर से उनके खाली कोई नहीं जाता
जेबें खाली भले पड़ी हों, कुछ भी न हो देने को
पर दुआओं के धनी बड़े होते हैं ।
जो एक कमरे के घर में रहते हैं
उनके दिल अक्सर बड़े होते हैं ।

कमरे एक से दो भले न हो पायें
पर महलों के सपने बड़े होते हैं
सपना होगा सच, ये एक दिन
इसी कोशिश में बच्चे बड़े होते हैं ।
बच्चे भी शायद सब जान जाते हैं
नहीं कहेंगे चलने को मेले में, चुपचाप रहेंगे
इनके बच्चे भी कितने बड़े होते हैं ।
जो एक कमरे के घर में रहते हैं
उनके दिल अक्सर बड़े होते हैं ।

कोई इनका सगा हो न हो
पर ये सबके लिये खडे़ होते हैं
क्या बिगाड़ते हैं ये किसी का,
क्यों लोग इनके पीछे पड़े होते हैं ?
इसिलिये बडे़ कहते हैं शायद
गरीब को न सताओ, कोई नहीं जानता
भगवान किस रूप में खडे़ होते हैं ।
जो एक कमरे के घर में रहते हैं
उनके दिल अक्सर बड़े होते हैं ।


पीयूष सिंह

Sunday, 6 March 2011

ये इंसान मर चुका है

हर कोने में धूल पड़ी है
सन्नाटा भी गहरा है
धमाका जरा जोर से करना
ये इंसान बहरा है

लाल खून से रंगी हैं चीखें
सन्नाटे को चीर रहीं
पथराई इन आँखों में
एक बूँद भी नीर नहीं
अंधियारे में मार काट का
कैसा गोरख धंधा है?
सूरज जरा जोर से चमको
ये इंसान अंधा है

सब कुछ सामने हो कर भी
सबके मुख पर ताला है
न्याय की गुहार पर
सच का मुख काला है
कायरों की बस्ती में
सबके पास मूँगा है
तलवार डाल दो हलक में
ये इंसान गूँगा है

इंसानों के जलते घर और
आँच तापता इंसान है
इंसानों के इन कर्मों पर
पाषाण बना इंसान है
इंसानों से इंसान क्या
इतना डर चुका है?
जाओ जला दो किसी कोने में
ये इंसान मर चुका है

पीयूष सिंह

Sunday, 30 January 2011

वो महिला

वो महिला
सिर पर उठाए
कुछ ईंट अैर पत्थर
उस बड़ी इमारत से देखो
तो पूरी चींटी सी लगती है
चींटी : जो कभी भी मानव द्वारा
कुचल दी जाती है
पर वो चल रही है
इसलिए नहीं
कि किसी ने उसे कुचला नहीं
बल्कि इसलिए
कि उसमें दृढ़ता है विश्वास है।

वो महिला
बरतन माँज रही है
और कुछ टुकड़े रोटी के
इक्ट्ठे कर रखे हैं
शायद कोई भूखा है।

वो महिला
कपड़े धो रही है
और पुराने कपड़ों की चाह है
शायद कोई नंगा है।

वो महिला
आज शय्या पर लेटी है
उसका एकमात्र अपना
जिसके लिए उसने रोटी जुटाई
कपड़े जुटाए
चींटी से मानव बनाया
वो आज उसे छोड़
मानवों में व्यस्त है।

वो महिला
चींटी थी पर अफसोस न था
लेकिन अब,
उसका दृढ़ता और विश्वास

कुचला गया है।

वो महिला
अब मर चुकी है।


पीयूष सिंह

Sunday, 16 January 2011

तुम

नभ में घोर अंधकार के बाद
जो प्रभात आई है,
उसके पीछे तुम हो।
धरती पर सूखी बयार के बाद
जो वृष्टि आई है,
उसके पीछे तुम हो।
बाग में पतझड़ के बाद
जो हरयाली आई है,
उसके पीछे तुम हो।
बस्ती में वर्षों की सुन्सानियत के बाद
जो खु्शी की झंकार आई है,
उसके पीछे तुम हो।
इतने बुरे स्वप्नों के बाद
जो अच्छी नींद आई है,
उसके पीछे तुम हो।
होठों पर विषाद के बाद
जो हँसी आई है,
उसके पीछे तुम हो।
जीवन में इतने कंपन के बाद
जो स्थिरता आई है,
उसके पीछे तुम हो।
वर्षों की निष्क्रियता के बाद
जो नव क्राँति आई है,
उसके पीछे तुम हो।
कल्पना के सागर में शांति के बाद
जो नव तरंग आई है,
उसके पीछे तुम हो।
जीवन में इतनी तलाश के बाद
जो कविता आई है,
उसके पीछे तुम हो।

पीयूष सिंह

Thursday, 30 December 2010

पावनता की ओर

जब बिना कुछ कहे ही,
सब कुछ कह दिया जाए।
जब किसी को कुछ बताया न हो,
पर उसको सब कुछ पता हो।
जब सब कोई सब कुछ जानता हो,
पर फिर भी कुछ बाहर न हो।
जब प्रत्यक्षता में तो शांति हो,
पर अप्रत्यक्षता में उमंग नृत्य करती हो।
जब पंछी स्वच्छंद गीत न गा कर,
मन में ही प्रफुल्लित हो गुनगुनाते हों।
जब शब्दों का महत्व समाप्त हो,
और मौन भाषा प्रयुक्त हो।
जब पूरा दिन स्वप्नों में बीते,
पर फिर भी स्वपनिल जीवन की इच्छा हो।
जब दूर होकर भी,
पास होने का एहसास हो।
जब आँसुओं में भी,
खुशी का आभास हो।
जब भावनाओं को महसूस किया जाए।
जब दूर से ही मन को पढ़ लिया जाए।
जब अनुरोधों को टाला न जा सके।
जब अधिकार होने का आभास हो।
तब आप ये समझिए कि
आप पावनता की ओर बढ़ रहे हैं।
पावनता! मन और मस्तिष्क की।
एक पावन सोच,
जो प्रेम और स्नेह का संचार करती है।
ऐसी सोच में लिप्त;मगन होकर,
मन बढ़ चला है,
ऐसी फुलवारी की ओर
जहाँ पावनता की सुगंध सर्वत्र फैली है,
जहाँ माली हर्ष का हार लिए अभिनंदन करता है,
जहाँ आनन्द के फूल,
प्रेम सुधा से सिंचित होकर खिलते हैं,
जहाँ कष्ट के कंटकों के लिए स्थान नहीं है।
ऐसी फुलवारी में जाने को,
मन उत्सुक है, व्याकुल है।
इसकी संभावना शायद शून्य हो,
या फिर सम्पूर्ण हो,
ये सोचे बिना
मन चल पड़ा है
और निरंतर चलता रहेगा।

पीयूष सिंह

Tuesday, 28 December 2010

मुर्दा जी उठा

ये कोई भूत नहीं
और न ही कोई चमत्कार है।
अरे! देखो लोगों देखो,
मुर्दों की बस्ती में,
इक मुर्दा जी उठा है।

सदियों से मृत इस बस्ती में,
आज एक मुर्दे ने
एक सपना देखा है
और फिर से जीने की चाह प्रकट की है।

तो क्या ये कोई गुनाह है?
गुनाह तो नहीं,
पर कुछ लोग, जो जीवित हैं,
इसे गुनाह मानते हैं,
और उनकी इस चाह को
कर्बिस्तान में दफनाते हैं।
शायद वे डरते हैं कि
अगर कहीं कोई मुर्दा जी उठा
तो वे मृत न हो जाएँ।
इसलिए जीने के लिए लड़ो
मगर प्यार से।

राह में तुम्हें जो कोई भी,
इस स्वरचित मृत्यु की
गोद में सुप्त दिखाई दे,
उसे जगाओ और ये समझाओ,
कि मनुष्य संसार में सिर्फ
एक बार ही मरता है।

पीयूष सिंह

क्षण भर जीवन


हृदय में अंकित,
रक्त रंजित
एक चित्र है।

जिसमें मानव तड़पता हुआ
अंश भर जीवन को ललकता हुआ
दीख पड़ता है।

मृत्यु दो कदम पर है
पर जीवन की इच्छा चरम पर है
बस कुछ साँसें शेष हैं।

हो कोई चमत्कार
पुनः हो प्राणों का संचार
लेकिन प्राण हैं कि रुकते नहीं।

कटे अंग पड़े थे छिन्न भिन्न
देखकर उनको मन होता खिन्न
लोग लड़ रहे थे।

ढूँढ़ता है दोष अपना
क्यों टूटा उसका सपना
ये लहू लुहान बदन पड़ा है।

वो तो बस यूँ ही जा रहा था
अपने घर को जा रहा था
आज उसे नौकरी मिली थी।

उसके पास एक बच्चा दौड़ता आया
''मुझे बचाओ'' वह चिल्लाया
लोग उसे दौड़ा रहे थे।

उसने बच्चे को शरण दी
और लोगों ने उसे मृत्यु चरण दी
लोगों ने उसे काट दिया।

वह बेसुध गिरा पड़ा है
नहीं पास कोई खड़ा है
प्राण जाने को हैं।

आँखों में खुशियों की झिलमिल चमक
कुछ और देर जीने की ललक
वह खुशियाँ बाँटना चाहता है।

वह सोचता था पर्व होगा
सबको उस पर गर्व होगा
पर सब मिट गया।

पर्व मातम बन गया
खुशियों का दौर थम गया
आँसू ही आँसू होंगे।

क्षण भर की साँसें अब रुक गईं
खुली पलकें भी अब झुक गईं
वह मर चुका है।

पीयूष सिंह

Saturday, 23 January 2010

बापू मुझे खिलौना ला दो

'बापू मुझे खिलौना ला दो
गाड़ी, घोड़ा, गुड़िया ला दो
गाड़ी हो चार पहिए वाली
बटन दबाकर चलने वाली
घोड़ा हो लकड़ी का जिसमें
बैठे झूला झूले जिसमें
गुड़िया कोई सुनैना ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।

पप्पू मेरा दोस्त है जो
खेले रोज़ है इनसे वो
मैं जो कहूँ कि मुझे दिखा दो
मुझसे कह दे हाथ हटा लो
मैं बस यूँ ही रहूँ देखता
और वो मजे से रहे खेलता।
सारे नहीं तो एक ही ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

बेटा तू कितना मासूम
नहीं अभी तुझे मालूम
कि तेरा बाप कबाड़ी है
किस्मत तेरी उजाड़ी है।
टीन के डिब्बे,शीशी बोतल
बनें हैं तेरा आज और कल
अन्जान बेचारा कहता ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।

माँग रहा मेरा बच्चा मुझसे
बचपन सीधा सच्चा मुझसे
पर मैं कबाड़ में पलने वाला
बचपन को उसके दलने वाला
सोच रहा क्या दूँ जवाब
मैं कैसे उसका करूँ हिसाब
गूँज रहा कानों में ''ला दो!
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

मैं कबाड़ी कबाड़ लाया
वहीं से ढूँढ़कर "कार" लाया
बड़ों के लिए वो बेकार थी
पर मेरे बच्चे के लिए वो "कार" थी
देखकर उसको हुआ वो स्थिर
मैंनें कहा ''लो खेलो, फिर -
कभी नहीं अब कहना ला दो,
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

गाड़ी नहीं ये वैसी थी
न उसके मित्र के जैसी थी
आकर पास वो रोने लगा
और मुझसे वो कहने लगा
''अरे ये तो चलती भी नहीं
क्यों तुम्हें वैसी मिलती भी नहीं
मुझको तुम वैसी ही ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

पता नहीं क्यों क्रोध है आया
मैंने उस पर हाथ उठाया
बच्चा मेरा रोने लगा
आँसू, इच्छा धोने लगा
शांत है वो अब कुछ नहीं कहता
इच्छाओं को मन में ही रखता
नहीं कभी अब कहता ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।

Wednesday, 25 March 2009

प्रेम


प्रेम यदि मिलन है तो,
प्रेम जुदाई भी है।
प्रेम यदि आगमन है तो,
प्रेम विदाई भी है।
प्रेम यदि पाना है तो,
प्रेम प्रतीक्षा भी है।
प्रेम यदि परिणाम है तो,
प्रेम परीक्षा भी है।
प्रेम यदि पाना है तो,
प्रेम कुछ खोना भी है।
प्रेम यदि हँसना है तो,
प्रेम कभी रोना भी है।
प्रेम यदि ईश्वर है तो,
प्रेम सच्ची आस्था भी है।
प्रेम यदि लक्ष्य है तो,
प्रेम वहाँ का रास्ता भी है।
प्रेम यदि सर्वस्व समर्पण है तो,
प्रेम सम्पूर्ण अधिकार भी है।
प्रेम यदि मीठे बोल हैं तो,
प्रेम कभी तकरार भी है।
प्रेम यदि इच्छा पूर्ति है तो,
प्रेम त्याग भी है।
प्रेम यदि सांसारिकता है तो,
प्रेम बैराग भी है।
प्रेम यदि जादू है तो,
प्रेम यही मंत्र हर बार है,
प्रेम यदि जीवन है तो,
प्रेम बस एक बार है।

Sunday, 22 March 2009

पागलों का विश्व

इक पागल, पागल से कहे
कि मैं पागल,
ये सब जानें और सब कहें
पर तू पागल !
ये सब जानें और कोई न कहे।
क्यों? क्योंकि,
सब डरते हैं सत्य के बाहर आने से
सब डरते हैं भेद खुल जाने से।
अरे!
जो देखकर अंधा हो,
जो सुनकर बहरा हो,
जो बोलकर गूँगा हो,
जो हाथ पैर होकर लाचार हो,
वो पागल ही तो है।
कोई मोह माया में पागल,
कोई ऊँच नीच में पागल,
कोई पागल है कुछ पाने में,
कोई पागल है कुछ बचाने में,
कोई हृदय से पागल,
कोई अपने दर्जे से पागल,
अरे सब के सब पागल ही तो हैं।
लेकिन हम!
हम मोह माया से दूर,
हम ऊँच नीच से दूर,
हम खोने पाने से दूर,
हम सुख दुख से दूर,
हम मस्ती के पुजारी
अनभिज्ञ, अन्जान
पागल हैं तुम्हारी नजरों में।
अरे हमारे लिए तो पागलखाने हैं,
पर तुम्हारा पागलखाना कहाँ है?
शायद ये समूचा विश्व !
हा! हा! ये पागलों का विश्व ! ! !

पीयूष सिंह

Sunday, 15 March 2009

एक वार्ता कलम से


मैं :-
ऐ मेरी कलम!
इस समूचे विश्व में
जहाँ लगता है कि सर्वत्र प्रकाश है
पर असलियत ये है कि
प्रकाश के पीछे घोर तिमिर है।
जहाँ लगता है कि सर्वत्र हँसी है
पर असलियत ये है कि
हँसी के पीछे घोर विषाद है।
जहाँ लगता है कि सर्वत्र विश्वास है
पर असलियत ये है कि
विश्वास के पीछे घोर छल है।
जहाँ अपनी असलियत छुपाए
मुखौटाधारियों का साम्राज्य है।
जहाँ भीड़ तो है पर फिर भी
सुन्सानियत का माहौल है।
ऐसे विश्व में मुझे खुशी है कि
मेरे साथ तू है।
निर्जीव है पर जीवितों से अच्छी,
निश्छल, प्रकाशमान, हँसमुख और असली
मेरी कलम।
मेरे हाथों के स्पर्शमात्र से ही
हृदय के तार तुझसे जुड़ जाते हैं
सारा दुख और विषाद जो हृदय में है
तेरी स्याही में घुल जाता है
और फिर तू उसे कागज़ पर लाकर
स्वयं तो समझती है,
समूचे विश्व को समझाती है।
धन्यवाद है तुझको
जो मुझे जानती है, समझती है
धन्यवाद है तुझको
जो तू मेरे साथ है।


कलम :- .
मित्र! ऐ मेरे मित्र!
क्यों करता है मुझे धन्यवाद
मुझे पाना तो तेरा अधिकार है।
मैं साथ हूँ उन सब के
जो साफ हैं, हँसमुख हैं
मुखौटों से रहित हैं
पर फिर भी अकेले हैं।
आखिर सबको एक साथी की ज़रूरत है।
जब तक तू न बदलेगा,
मैं तेरे सानिध्य रहूँगी।


-पीयूष सिंह