Thursday, 30 December 2010

पावनता की ओर

जब बिना कुछ कहे ही,
सब कुछ कह दिया जाए।
जब किसी को कुछ बताया न हो,
पर उसको सब कुछ पता हो।
जब सब कोई सब कुछ जानता हो,
पर फिर भी कुछ बाहर न हो।
जब प्रत्यक्षता में तो शांति हो,
पर अप्रत्यक्षता में उमंग नृत्य करती हो।
जब पंछी स्वच्छंद गीत न गा कर,
मन में ही प्रफुल्लित हो गुनगुनाते हों।
जब शब्दों का महत्व समाप्त हो,
और मौन भाषा प्रयुक्त हो।
जब पूरा दिन स्वप्नों में बीते,
पर फिर भी स्वपनिल जीवन की इच्छा हो।
जब दूर होकर भी,
पास होने का एहसास हो।
जब आँसुओं में भी,
खुशी का आभास हो।
जब भावनाओं को महसूस किया जाए।
जब दूर से ही मन को पढ़ लिया जाए।
जब अनुरोधों को टाला न जा सके।
जब अधिकार होने का आभास हो।
तब आप ये समझिए कि
आप पावनता की ओर बढ़ रहे हैं।
पावनता! मन और मस्तिष्क की।
एक पावन सोच,
जो प्रेम और स्नेह का संचार करती है।
ऐसी सोच में लिप्त;मगन होकर,
मन बढ़ चला है,
ऐसी फुलवारी की ओर
जहाँ पावनता की सुगंध सर्वत्र फैली है,
जहाँ माली हर्ष का हार लिए अभिनंदन करता है,
जहाँ आनन्द के फूल,
प्रेम सुधा से सिंचित होकर खिलते हैं,
जहाँ कष्ट के कंटकों के लिए स्थान नहीं है।
ऐसी फुलवारी में जाने को,
मन उत्सुक है, व्याकुल है।
इसकी संभावना शायद शून्य हो,
या फिर सम्पूर्ण हो,
ये सोचे बिना
मन चल पड़ा है
और निरंतर चलता रहेगा।

पीयूष सिंह

Tuesday, 28 December 2010

मुर्दा जी उठा

ये कोई भूत नहीं
और न ही कोई चमत्कार है।
अरे! देखो लोगों देखो,
मुर्दों की बस्ती में,
इक मुर्दा जी उठा है।

सदियों से मृत इस बस्ती में,
आज एक मुर्दे ने
एक सपना देखा है
और फिर से जीने की चाह प्रकट की है।

तो क्या ये कोई गुनाह है?
गुनाह तो नहीं,
पर कुछ लोग, जो जीवित हैं,
इसे गुनाह मानते हैं,
और उनकी इस चाह को
कर्बिस्तान में दफनाते हैं।
शायद वे डरते हैं कि
अगर कहीं कोई मुर्दा जी उठा
तो वे मृत न हो जाएँ।
इसलिए जीने के लिए लड़ो
मगर प्यार से।

राह में तुम्हें जो कोई भी,
इस स्वरचित मृत्यु की
गोद में सुप्त दिखाई दे,
उसे जगाओ और ये समझाओ,
कि मनुष्य संसार में सिर्फ
एक बार ही मरता है।

पीयूष सिंह

क्षण भर जीवन


हृदय में अंकित,
रक्त रंजित
एक चित्र है।

जिसमें मानव तड़पता हुआ
अंश भर जीवन को ललकता हुआ
दीख पड़ता है।

मृत्यु दो कदम पर है
पर जीवन की इच्छा चरम पर है
बस कुछ साँसें शेष हैं।

हो कोई चमत्कार
पुनः हो प्राणों का संचार
लेकिन प्राण हैं कि रुकते नहीं।

कटे अंग पड़े थे छिन्न भिन्न
देखकर उनको मन होता खिन्न
लोग लड़ रहे थे।

ढूँढ़ता है दोष अपना
क्यों टूटा उसका सपना
ये लहू लुहान बदन पड़ा है।

वो तो बस यूँ ही जा रहा था
अपने घर को जा रहा था
आज उसे नौकरी मिली थी।

उसके पास एक बच्चा दौड़ता आया
''मुझे बचाओ'' वह चिल्लाया
लोग उसे दौड़ा रहे थे।

उसने बच्चे को शरण दी
और लोगों ने उसे मृत्यु चरण दी
लोगों ने उसे काट दिया।

वह बेसुध गिरा पड़ा है
नहीं पास कोई खड़ा है
प्राण जाने को हैं।

आँखों में खुशियों की झिलमिल चमक
कुछ और देर जीने की ललक
वह खुशियाँ बाँटना चाहता है।

वह सोचता था पर्व होगा
सबको उस पर गर्व होगा
पर सब मिट गया।

पर्व मातम बन गया
खुशियों का दौर थम गया
आँसू ही आँसू होंगे।

क्षण भर की साँसें अब रुक गईं
खुली पलकें भी अब झुक गईं
वह मर चुका है।

पीयूष सिंह

Saturday, 23 January 2010

बापू मुझे खिलौना ला दो

'बापू मुझे खिलौना ला दो
गाड़ी, घोड़ा, गुड़िया ला दो
गाड़ी हो चार पहिए वाली
बटन दबाकर चलने वाली
घोड़ा हो लकड़ी का जिसमें
बैठे झूला झूले जिसमें
गुड़िया कोई सुनैना ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।

पप्पू मेरा दोस्त है जो
खेले रोज़ है इनसे वो
मैं जो कहूँ कि मुझे दिखा दो
मुझसे कह दे हाथ हटा लो
मैं बस यूँ ही रहूँ देखता
और वो मजे से रहे खेलता।
सारे नहीं तो एक ही ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

बेटा तू कितना मासूम
नहीं अभी तुझे मालूम
कि तेरा बाप कबाड़ी है
किस्मत तेरी उजाड़ी है।
टीन के डिब्बे,शीशी बोतल
बनें हैं तेरा आज और कल
अन्जान बेचारा कहता ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।

माँग रहा मेरा बच्चा मुझसे
बचपन सीधा सच्चा मुझसे
पर मैं कबाड़ में पलने वाला
बचपन को उसके दलने वाला
सोच रहा क्या दूँ जवाब
मैं कैसे उसका करूँ हिसाब
गूँज रहा कानों में ''ला दो!
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

मैं कबाड़ी कबाड़ लाया
वहीं से ढूँढ़कर "कार" लाया
बड़ों के लिए वो बेकार थी
पर मेरे बच्चे के लिए वो "कार" थी
देखकर उसको हुआ वो स्थिर
मैंनें कहा ''लो खेलो, फिर -
कभी नहीं अब कहना ला दो,
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

गाड़ी नहीं ये वैसी थी
न उसके मित्र के जैसी थी
आकर पास वो रोने लगा
और मुझसे वो कहने लगा
''अरे ये तो चलती भी नहीं
क्यों तुम्हें वैसी मिलती भी नहीं
मुझको तुम वैसी ही ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।''

पता नहीं क्यों क्रोध है आया
मैंने उस पर हाथ उठाया
बच्चा मेरा रोने लगा
आँसू, इच्छा धोने लगा
शांत है वो अब कुछ नहीं कहता
इच्छाओं को मन में ही रखता
नहीं कभी अब कहता ला दो
बापू मुझे खिलौना ला दो।

Wednesday, 25 March 2009

प्रेम


प्रेम यदि मिलन है तो,
प्रेम जुदाई भी है।
प्रेम यदि आगमन है तो,
प्रेम विदाई भी है।
प्रेम यदि पाना है तो,
प्रेम प्रतीक्षा भी है।
प्रेम यदि परिणाम है तो,
प्रेम परीक्षा भी है।
प्रेम यदि पाना है तो,
प्रेम कुछ खोना भी है।
प्रेम यदि हँसना है तो,
प्रेम कभी रोना भी है।
प्रेम यदि ईश्वर है तो,
प्रेम सच्ची आस्था भी है।
प्रेम यदि लक्ष्य है तो,
प्रेम वहाँ का रास्ता भी है।
प्रेम यदि सर्वस्व समर्पण है तो,
प्रेम सम्पूर्ण अधिकार भी है।
प्रेम यदि मीठे बोल हैं तो,
प्रेम कभी तकरार भी है।
प्रेम यदि इच्छा पूर्ति है तो,
प्रेम त्याग भी है।
प्रेम यदि सांसारिकता है तो,
प्रेम बैराग भी है।
प्रेम यदि जादू है तो,
प्रेम यही मंत्र हर बार है,
प्रेम यदि जीवन है तो,
प्रेम बस एक बार है।

Sunday, 22 March 2009

पागलों का विश्व

इक पागल, पागल से कहे
कि मैं पागल,
ये सब जानें और सब कहें
पर तू पागल !
ये सब जानें और कोई न कहे।
क्यों? क्योंकि,
सब डरते हैं सत्य के बाहर आने से
सब डरते हैं भेद खुल जाने से।
अरे!
जो देखकर अंधा हो,
जो सुनकर बहरा हो,
जो बोलकर गूँगा हो,
जो हाथ पैर होकर लाचार हो,
वो पागल ही तो है।
कोई मोह माया में पागल,
कोई ऊँच नीच में पागल,
कोई पागल है कुछ पाने में,
कोई पागल है कुछ बचाने में,
कोई हृदय से पागल,
कोई अपने दर्जे से पागल,
अरे सब के सब पागल ही तो हैं।
लेकिन हम!
हम मोह माया से दूर,
हम ऊँच नीच से दूर,
हम खोने पाने से दूर,
हम सुख दुख से दूर,
हम मस्ती के पुजारी
अनभिज्ञ, अन्जान
पागल हैं तुम्हारी नजरों में।
अरे हमारे लिए तो पागलखाने हैं,
पर तुम्हारा पागलखाना कहाँ है?
शायद ये समूचा विश्व !
हा! हा! ये पागलों का विश्व ! ! !

पीयूष सिंह

Sunday, 15 March 2009

एक वार्ता कलम से


मैं :-
ऐ मेरी कलम!
इस समूचे विश्व में
जहाँ लगता है कि सर्वत्र प्रकाश है
पर असलियत ये है कि
प्रकाश के पीछे घोर तिमिर है।
जहाँ लगता है कि सर्वत्र हँसी है
पर असलियत ये है कि
हँसी के पीछे घोर विषाद है।
जहाँ लगता है कि सर्वत्र विश्वास है
पर असलियत ये है कि
विश्वास के पीछे घोर छल है।
जहाँ अपनी असलियत छुपाए
मुखौटाधारियों का साम्राज्य है।
जहाँ भीड़ तो है पर फिर भी
सुन्सानियत का माहौल है।
ऐसे विश्व में मुझे खुशी है कि
मेरे साथ तू है।
निर्जीव है पर जीवितों से अच्छी,
निश्छल, प्रकाशमान, हँसमुख और असली
मेरी कलम।
मेरे हाथों के स्पर्शमात्र से ही
हृदय के तार तुझसे जुड़ जाते हैं
सारा दुख और विषाद जो हृदय में है
तेरी स्याही में घुल जाता है
और फिर तू उसे कागज़ पर लाकर
स्वयं तो समझती है,
समूचे विश्व को समझाती है।
धन्यवाद है तुझको
जो मुझे जानती है, समझती है
धन्यवाद है तुझको
जो तू मेरे साथ है।


कलम :- .
मित्र! ऐ मेरे मित्र!
क्यों करता है मुझे धन्यवाद
मुझे पाना तो तेरा अधिकार है।
मैं साथ हूँ उन सब के
जो साफ हैं, हँसमुख हैं
मुखौटों से रहित हैं
पर फिर भी अकेले हैं।
आखिर सबको एक साथी की ज़रूरत है।
जब तक तू न बदलेगा,
मैं तेरे सानिध्य रहूँगी।


-पीयूष सिंह